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बेटी (कविता)....Daughter (poem)

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बेटी हाँ, तुम मेरी बेटी हो मेरे दिल के बहुत करीब हो इतने करीब कि तुमको  खुद में महसूस कर रही हूँ हर पल  हाँ, तुम मेरी बेटी हो। तुम संभाल लेती हो मेरे आवेश को भांप लेती मन के हर भाव को  समेट लेती हो जब मैं बिखरती हूँ  हाँ, तुम मेरी बेटी हो। सखी हो मेरी,हमराज भी मेरे मन का सुकून भी  रोशनी हो इस घर की नटखट हो थोड़ी शैतान भी  हाँ, तुम मेरी बेटी हो डोर हो मेरे परिवार की बांध रखा है सबको प्यार से भाई की राजदार हो उसकी सलाहकार भी  दोनों की चुहलबाजी से  गुलज़ार है ये चमन सदा यूँ ही बना रहे  ये प्यार का बंधन।                     शाम्भवी(सरोज) ______________________________________________ English Translation  Daughter   Yes you are my daughter  Be very close to my heart  So close to you  Feeling myself every moment  Yes, you are my daughter.  You manage  To my charge ...

खोटा सिक्का (कहानी)........ Counterfeit coin(story)

खोटा  सिक्का वह पापा का आख़िरी ख़त था, जिसमें उन्होंने...लिखा था बेटा तू मुझसे मिलने कब आ रही है? पर कोमल को तो अपनी बिज़ी लाइफ से फुर्सत ही नहीं थी। वह सिंगल मदर थी, अपनी बेटी की पूरी जिम्मेदारी उस पर ही थी।  पूरा दिन अपने ऑफिस में व्यस्त रहने के बाद शाम को घर आती तो बेटी से बातें करने ,खेलने में मस्त हो जाती। कब रात से सुबह होती कोमल को पता ही नही चलता।....... वह 8 साल से अपने घर ही नहीं गई थी। 2012 में उसने शिमला छोड़ा था और अब 2020 था। आखिर क्या कारण था? कि इतने सालों में कभी उसको अपने पापा मम्मी की याद नहीं आई।  ये उसकी मज़बूरी थी या कुछ और। पापा के आये इस खत ने उसे  शिमला जाने पर मजबूर कर दिया। उसने अपनी 4 साल की बेटी को लिया और कार बुक की। अपनी बहुत ही नज़दीकी सहेली को फोन पर सब बताया और अपने ऑफिस , जो उसका खुद का ही था, 1हफ्ते की छुट्टी ली और अपने सहयोगी को ऑफिस की जिम्मेदारी देकर वह बहुत सुबह ही वह निकल गई शिमला के लिए।  क्यारा , उसकी बेटी सो गई थी। वो भी गाड़ी की रफ्तार के साथ पुरानी यादों में खो गई। समय भी कैसे रेत की तरह उसके हा...

इंटरनेट (कविता)...Internet (poem)

इंटरनेट    अरे! मित्र क्या है, तुम्हारा हाल? खोए हो कहाँ, कैसा चल रहा है काम? क्या बताऊँ तुमको, अपना हाल सुनाऊँ तुमको  झटपट, बनते मेरे काम  सारी दुनिया से मैं जुड़ जाऊं  जब भी साथ मैं इसका पाऊँ                                                           सब प्रश्नों के उत्तर दे दूँ खुद, को और भी बेहतर कर लूँ दुनिया के बनते इससे काम इंटरनेट है, इसका नाम  मालुम जो, कुछ करना हो तुरंत मित्र तुम, गूगल कर लो इसके द्वारा संसार टहल लो मनचाही तुम शापिंग कर लो  घर बैठे हम इससे पढ़ते हर विषय को तुरंत समझते पल-पल,निसदिन ज्ञान बढ़ाता हमें नई-नई तकनीक सिखाता  मित्र समझे तुम इसका कमाल इंटरनेट है बड़ा महान इंटरनेट है बड़ा महान।                                      शाम्भ...

कबीर के दोहे अर्थ के साथ।

कबीर के दोहे  ( गुरु पर दोहे) कबीर के दोहे कई दशकों से हमर मार्गदर्शन करते आ रहे हैं और आने वाले समय में भी हमारा व हमारी भावी पीढ़ी का मार्गदर्शन करते रहेंगे। यहाँ कबीर के दोहे अर्थ सहित दिये जा रहे हैं। 1- गुरु गोविंद दोउ खड़े, काके लागूं पाँय । बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो मिलाय ॥ अर्थ – कबीर दास जी इस दोहे में कहते हैं कि अगर हमारे सामने गुरु और भगवान दोनों एक साथ खड़े हों तो आप किसके चरण स्पर्श करेंगे? गुरु ने अपने ज्ञान से ही हमें भगवान से मिलने का रास्ता बताया है इसलिए गुरु की महिमा भगवान से भी ऊपर है और हमें गुरु के चरण स्पर्श करने चाहिए। 2- यह तन विष की बेलरी, गुरु अमृत की खान | शीश दियो जो गुरु मिले, तो भी सस्ता जान || अर्थ – कबीर दास जी कहते हैं कि यह जो शरीर है वो विष (जहर) से भरा हुआ है और गुरु अमृत की खान हैं। अगर अपना शीश(सर) देने के बदले में आपको कोई सच्चा गुरु मिले तो ये सौदा भी बहुत सस्ता है। 3- सब धरती काजग करू, लेखनी सब वनराज | सात समुद्र की मसि करूँ, गुरु गुण लिखा न जाए || अर्थ – अगर मैं इस पूरी धरती के बराबर बड़ा कागज बनाऊं और दुनियां के सभी वृ...

कबीर का जीवन परिचय

कबीर   कबीर दास का जीवन परिचय कबीर दास हिन्‍दी साहित्‍य की ज्ञानाश्रयी शाखा में निर्गुण काव्‍य धारा के महत्‍वपूर्ण कवि है | कबीर का जन्‍म स्‍थान वाराणसी का लहरतारा ताल नामक स्‍थान माना गया है | इनका जन्‍म स्थान को लेकर अधिकांश विद्वानों ने अलग अलग मत दिए हैं। जन्‍म संवत 1455 सन् 1398 ई0 मृ त्‍यु संवत 1551 सन् 1494 ई0 कबीर दास के माता -पिता के बारे में सही साक्ष्‍य नहीं मिलते हैं लेकिन इनको नीरू तथा नीमा नामक (जुलाहा)दम्‍पत्ति ने इनका पालन पोषण किया था । कुछ विद्वानों का मत है कि विधवा महिला ने लोक लाज के भय से जन्‍म देते ही इन्‍हें त्‍याग दिया था।नीरू तथा नीमा ( जुलाहे)को ये तालाब के किनारे पड़े मिले थे और इन्‍होंने इनका पालन पोषण किया। कबीरदास मुसलमान वातावरण में पालन- पोषण होने के बावजूद उनमें हिन्‍दू संस्‍कारों की विशिष्‍ट छाप थी। कबीरदास का विवाह लोई नामक कन्‍या से हुआ था ।इनके दो संतानें भी उत्‍पन्‍न हुई पुत्र का नाम कमाल और पुत्री का नाम कमाली था। कबीरदास ने एक स्‍थान पर अपने पुत्र का आवाहन करते हुए कहा है- ’’बूड़ा वंश कबीर का उपजा पुत्र कमाल’’ मृत्‍यु ...

कहानी____कोटर और कुटीर ( सियारामशरण गुप्त)

लेखक परिचय :-सियारामशरण गुप्त (कहानी ___कोटर और कुटीर) hindilingua.com सारांश : मनुष्य  को दूसरों की सम्पत्ती की चाह ठीक नहीं है.दूसरों से माँगना और कर्जा  लेना भी स्वाभिमान के विरुद्ध है.एक कुटीर वासी ऐसे आदर्श जीवन से खुश होता है.कोटर में रहनेवाले चातक पुत्र वर्षा के पानी की प्रतीक्षा छोड़ गंगा की ओर उड़ रहा है.जब उसको गरीब  बुद्धन की स्वाभिमान भरी बात में चातक का उदाहरण बताया तो चातक पुत्र का अपने खानदानी गौरव  का पता चला.वह फिर गंगा की ओर जाना छोड़कर  अपने कोटर की ओर लौटा. यह छोटी -सी कहानी में स्वाभिमान की आदर्श सीख मिलती है.  सार: चातक पुत्र  को अधिक  प्यास लगी. उनके पिता जी से कहा कि प्यास के कारण मैं परेशान में हूँ. पिताजी ने समझाया कि हम तो वर्षा का पानी ही पीते हैं.इसी कारण से हमारे कुल का गौरव है.पुत्र ने कहा कि मनुष्य तो कुएं,तालाब ,आदि में वर्षा के पानी जमा करके कृषी करता है; तब पिता ने पोखरी का पानी पीने की सलाह दी. पुत्र ने उस गंदे पानी ,जानवर और मनुष्य का पीना,उसमें कीड़े का बिलबिलाना  .आदमियों का उस पानी प्रदूषित करना; प...

सियारामशरण गुप्त की कहानी (काकी)

काकी सियारामशरण गुप्त उस दिन बड़े सबेरे जब श्यामू की नींद खुली तब उसने देखा - घर भर में कुहराम मचा हुआ है। उसकी काकी – उमा - एक कम्बल पर नीचे से ऊपर तक एक कपड़ा ओढ़े हुए भूमि-शयन कर रही हैं, और घर के सब लोग उसे घेरकर बड़े करुण स्वर में विलाप कर रहे हैं। लोग जब उमा को श्मशान ले जाने के लिए उठाने लगे तब श्यामू ने बड़ा उपद्रव मचाया। लोगों के हाथों से छूटकर वह उमा के ऊपर जा गिरा। बोला - “काकी सो रही हैं, उन्हें इस तरह उठाकर कहाँ लिये जा रहे हो? मैं न जाने दूँ।” लोग बड़ी कठिनता से उसे हटा पाये। काकी के अग्नि-संस्कार में भी वह न जा सका। एक दासी राम-राम करके उसे घर पर ही सँभाले रही। यद्दापि बुद्धिमान गुरुजनों ने उन्हें विश्वास दिलाया कि उसकी काकी उसके मामा के यहाँ गई है, परन्तु असत्य के आवरण में सत्य बहुत समय तक छिपा न रह सका। आस-पास के अन्य अबोध बालकों के मुँह से ही वह प्रकट हो गया। यह बात उससे छिपी न रह सकी कि काकी और कहीं नहीं, ऊपर राम के यहाँ गई है। काकी के लिए कई दिन तक लगातार रोते-रोते उसका रुदन तो क्रमश: शांत हो गया, परन्तु शोक शांत न हो सका। वर्षा के अनन्तर एक ही दो द...